उपन्यास में संन्यास की बहुत व्याख्या है | जगतगुरु शंकराचार्य ने बहुत व्याख्या दी है | यहां दैत- अद्वैत और संन्यास की बड़ी परिभाषा जानने की जरूरत नहीं है | लेकिन संन्यास का संक्षेप अर्थ है कि द्रव्य में, नारी में, प्रतिष्ठा में और जायदाद में, धन में आदि में मन न जाय और भगवान में डूबा रहे  | सत्य में न्यास का मतलब है “संन्यास” | जो सच्चाई में डूबा रहे, सच्चाई की तरफ गति करे और इस जगत के तरफ न दौड़े वो संन्यास है | “ब्रह्म सत्यम् जगत मिथ्या” | और सत्य क्या है ? तो शंकराचार्य ने बोला है, ब्रह्म ही सच्चा है जगत मिथ्या है |

शंकराचार्य उपदेश दे रहे है एक राजा को , तो राजा बोले कि ‘यह जगत सब मिथ्या है?’ | तो शंकराचार्य कहे “हाँ सब मिथ्या है” | तो उसने हाथी दौड़ाया शंकराचार्य के पिछे तो शंकराचार्य भागने लगे तो बोले कि ‘अगर जगत मिथ्या है तो आप भाग क्यु रहे हो?’ | तब शंकराचार्य बोले कि ‘ए मूर्ख ! हाथी का दौड़ना भी मिथ्या है, तेरा भागना भी मिथ्या है, मेरा दौडना भी मिथ्या है सब मिथ्या है, तेरे को समझ में नहीं आ रहा है|’ सपने में कभी आपके पीछे हाथी दौड़ रहा है, सांप दौड़ रहा है तो आप एकाएक जग गये लेकिन सत्य कुछ नहीं होता, सब भ्रम है |

एक ताम्बे का पात्र है | तो कोई बोलते है की ‘यह भी मिथ्या है पात्र नहीं है’ | तो बोले ‘दिख रहा है, पात्र कयु नहीं है? वो धातु है, पितल है, ताम्बा है’ | तो बोले ‘तांबे के घड़े में से कटोरी बना दो, चम्मच बना दो और कुछ बना दो तो वो घड़ा मिट गया और चम्मच बन गया, कटोरी बन गयी | तो वो माया है, वो सच्चा नहीं होता | दिखता है लेकिन है नहीं’ | तो बोले ‘ऐसे ही जगत भी दिख रहा है लेकिन है नहीं’ | लेकिन नहीं है ये भी कैसे बोले इसको सिद्ध करने में बहुत लंबा समय लगता है | तर्क की बात है लेकिन अंत में ब्रह्म ही सबकुछ है, जगत है ही नहीं | जगत जो आप देख रहे हो वो है नहीं |

आम की गुठली है इसके अन्दर इतना बड़ा पेड़ है, दिखता नहीं है | जमीन में डालो तो माया से इतना बड़ा हो गया | इसमें अनेकों आम हो गये, गुठली हो गई ,एक में से लाखों हो गये आखिर एक में सब समा जाते हैं | ऐसे ही जगत है इतने में विराट स्वरुप है और विराट में अनंत है लेकिन है कुछ नहीं | यह वेदांत बोलता है इसीलिए इसमें तर्क की जरूरत नहीं है | लेकिन संन्यास का मतलब है मात्र ब्रह्म में, सोहम् में रहना, मस्ती में डूबे रहो और कहीं न मन जाय | भिक्षा मांगा, खा लिया मस्त रहो | कोई संग्रह नहीं | अब ऐसी अवस्था होनी चाहिए और कहीं मन नहीं जाये वो संन्यास | सच्चा त्यागी उसे कहते है | कपड़ा संन्यासी का पहन करके आप जो ये भिक्षा मांगो, हर जगह गुमो फिरो वो संन्यास नहीं है | एकबार भगवान के नाम पर भेख बदल दिया तो उसको दुसरे जगह हाथ क्या फैलाना ? एक ही जगह भिक्षा मांगलो आज मिल गया तो खालो ,कल की चिंता मत करो | शरीर निर्वाह के लिए भिक्षा मिला, खा करके मस्त रहो | इस प्रकार से जीसका मन ईश्वर में डूबा हो और “शरीरमाध्यं खलु धर्म साधनम्”, शरीर निर्वाह के लिए खाना मिल गया, मस्त सम्राट बन कर रहो, जो इस प्रकार से जी रहा है वो ही सच्चा संन्यासी है, वो सच्चा त्यागी है | ऐसा संक्षेप में बताया हुं आपको, बाकी तो इस की बहुत बड़ी व्याख्या है और बहुत प्रकार है |

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