ईश्वर के प्रति प्रेम कैसे बढे ?

प.पु.पुनीताचारिजि महाराज

इस जगत में सत्संग बहुत जरुरी हे ईश्वर को जानने के लिए | अगर आपको इसकी गहराई में जाना हो तो किसी अच्छे महापुरुष के पास जाकर कुछ सत्संग करो | वह आपको बताएगा की ईश्वर क्या हे और जगत क्या हे | ईश्वर के प्रति प्रेम रखना हो तो उसको जानना बहुत जरुरी हे |

एक उदहारण दे रहा हूँ की एक जगह एक भाई जो हे एक स्त्री के यहाँ जा रहे हे | यह सत्य घटना हे | वह शेठिया जो हे वो बहुत श्रीमंत हे और वह शादी किया रहा फिर भी वेश्या के वहां जाता रहा | उसकी पत्नी बहुत प्रार्थना करती रही की हमारे पति घर में संतुष्ट रहे उधर क्यों भागते हे | फिर भी उस शेठिया का मन पहले से उधर ही रहा | जबकि वेश्या किसी अच्छे महापुरुष के संपर्क से जन्मी रही, तो उसका मन पहले से इस संसार में नहीं हे | तो वह सोचती हे की यह भाई सुधर जाये तो अच्छा हे | और वह भाई उसीके पास जाता रहा जहाँ उसका आकर्षण ज्यादा रहा | तो वह वेश्या बोलती हे की कल यह भाई आये तो बोल देना की में बीमार हूँ और छः दिन के बाद आना | वह वापस आता हे की हमको मिलना ही हे | तो उसको बहार से ही बताया जाता हे की आप नहीं मिल सकते उनकी तबियत ठीक नहीं है | तो वह शेठिया बोलता हे की हम बस देख के चले जायेंगे | यह मन की तृप्ति जो हे , मन का आकर्षण जो हे और वासना की तृप्ति जो हे दृष्टि से भी होता हे , स्पर्श से भी होती हे और आलिंगन से होती हे | अनेक प्रकार संतोष के लिए हे | तो वह शेठिया बोलता हे की में सिर्फ देख कर चला जाऊंगा | तो उसको बताया जाता हे की उनको देखना भी मना हे , वह बीमार हे | तो शेठिया बहुत बिनती करता हे की जो भी खर्चा होगा इलाज का वो भी में दूंगा लेकिन मुझे सिर्फ उसे देखने दो | इस तरह शेठिया ने तड़पते तड़पते छ: दिन बिताए |

उसके बाद वह द्वार पे आके पूछता हे की अभी मिलेंगी ? तो बताया जाता हे की हाँ अभी मिलेंगी | उनको अंदर ले जाया जाता हे , एक रूम में बिठाया जाता हे जहाँ वह वेश्या रही | वह भाई बैठे | बैठते ही बोलते हे की अब में चलूँ ? तो वह वेश्या पूछती हे की इतने दिन आप मिलने के लिए तड़पते रहे और जाते भी नहीं रहे | अब जब मिल रहे हो तो १० मिनट में बोलते हो की चलता हूँ ? तो वह शेठिया बोलता है की आज यहाँ कुछ दुर्गन्ध सा आ रहा हे | वेश्या बोलती हे की तो में यहाँ इत्तर सेंट छंटवा दू , आप बैठो | लेकिन शेठिया बोलता हे की नहीं अब जाना हे | वेश्या पूछती है की क्या मुझसे प्रेम कम हो गया अभी ? शेठिया बोलता हे की अब आप देखने में भी अच्छी नहीं लगती हो , पहले की तरह नहीं दिख रही हो | तो वेश्या बोलती हे की तो हमारी सुंदरता के प्रति आपका आकर्षण रहा ! तो बात तो वही हे, जो सुंदरता हे वही माया आज सबको खींचती हे | तो हमारी जो सुंदरता रही वह यहाँ रखी हुई हे वह देख लो | छः दिन तक वह वेश्या अपना मल मूत्र सब एक हांड़ी में भरती रही | और उस शेठिया को सब खोल खोल कर बताने लगी की यही दुर्गन्ध आपको आ रहा हे | यही तो वह सुंदरता हे जो शरीर से निकल जाने के बाद मेरे शरीर का यह हाल हो गया हे | यह शरीर ऐसे ही हाड़ , मांस , परु से भरा हुआ हे | ऊपर से प्लास्टर हे जो लाल पिले सफ़ेद काले जो आप दीखते हो , एक दिन छिलजाएगा तो परु निकलेगा , फिर जिवात पड़ेगी , फिर वह गंध मरेगा | तो आपको प्रेम इससे है या जो अंदर बैठा हुआ है उससे है ? अंदर बैठने वाला सुद्ध बुद्ध आत्मा है जो परमात्मा का स्वरुप है | तुझे वो नहीं दीखता है लेकिन सिर्फ बहार की माया दिखती है | उस दिन से शेठिया बदल गया की मैं कहाँ भटक रहा हूँ |

अंदर बैठने वाला ईश्वर है जो आपको चला रहा है , फिरा रहा है , रास्ता बता रहा है | आप इस माया मैं मत पड़ो | माया जो है वह आपको खींचती है | “मम माया दुरत्यया ” , मेरी माया इतनी कठिन है की इसको पार करना गुरु कृपा सिवाय , ईश्वर कृपा सिवाय संभव नहीं होता है | इसीलिए साधना मै गुरु कृपा बहुत जरुरी है | गुरु का आशीर्वाद ले कर साधना करोगे तो पार हो जाओगे नहींतो इसी माया में भटका करोगे | तुम्हारे अंदर का जो कुछभी हे मन , चित्त , बुद्धि सब इधर ही खलास हो जायेगा और आपको सच का ज्ञान भी नहीं होगा | इसीलिए तुम सोचो की तुम अंदर बैठे हो वो कौन हो ? तुम उसीके स्वरुप हो , वही हो | लेकिन माया के चक्कर में भूल गए हो इसीलिए भटक रहे हो | समझ में आया ?

इसीलिए मै बोलता हूँ की ईश्वर के प्रति प्रेम होने से यह माया छूट जाती हे , उससे प्रिय और कुछ है ही नहीं | २४ घंटा आपका पालन कर रहा है , आपका रक्षण कर रहा है , आपकी सहायता कर रहा है , आपको अच्छे मार्ग में चलने की प्रेरणा कर रहा है | उससे प्रेम करो , इस माया में मत पड़ो | जगत में जो कुछ भी दीखता है वह सब नश्वर है , रहेगा कुछ नहीं | रहेगा बस वह(ईश्वर) और आप | उपनिषद मैं लिखा है की ह्रदय के बिच में दो पक्षी बैठे है आत्मा और परमात्मा | एक एक को देखता है , एक एक को नहीं देखता | आपके अंदर जो संस्कार है वह १ जन्म का नहीं है लेकिन कई जन्मो का है | कितना भी बोध दे , समझावे लेकिन मन आपका उधर ही जाएगा , भगवान नहीं दिखेगा | माया ही दिखेगी | इसीलिए माया को समझो , ईश्वरी माया है वो | गुरु कृपा से हट जाएगी और भगवान के चरण कमल में मन लगा के बैठो | ईश्वर बहुत दयालु है , अनेको जन्मो से भटक रहे हो , वह हाथ फैला कर खड़ा है की बेटा मेरी तरफ आओ , इस जंजाल से मुक्त हो कर के आत्म कल्याण करो | इस सारे जगत में मुझे निहारते हुए मेरी तरफ खींचो , मेरी तरफ आओ | भगवान ऐसे हाथ फैलाए खड़ा है लेकिन आप समझ नहीं रहे हो | इसीलिए जगत को त्याग मत करो | उसके अंदर ईश्वर को देखते हुए , जो कुछ भी कर रहे हो वो उसीकी सेवा है यह मानते हुए उधर दौड़ो , की हमें वहीँ जाना है | इसीलिए भगवन के प्रति प्रेम बढ़ने के लिए ज्ञान और समझ बहुत जरुरी है , सत्संग जरुरी है , यह जगत क्या है और आप क्या हो | इसीलिए इसे समझोगे और शरीर के विज्ञान को समझोगे तो इसके अंदर जो बैठा हुआ है उससे प्रेम होगा | मैं भी आप लोगो से बहुत प्रेम करता हूँ , लेकिन आपके हाड़ मांस के शरीर से नहीं , आपके अंदर जो बैठा हुआ है वह हमारा ही तत्व है , हमारा ही स्वरुप है , भटक गए हो इसीलिए मै खींचता हूँ | लेकिन मेरा प्रेम अंदर का है , मैं ऐसे आपसे मिलता नहीं हूँ , स्पर्श नहीं करता हूँ , स्पर्श करूँ तो कोई दूसरा विज्ञान खड़ा हो जायेगा | लोग दूसरा कुछ समझेंगे , इसीलिए मन से सबको मैं प्यार करता हूँ और सोचता हूँ की आप उस परम तत्व की तरफ चलो तो हम और आप दोनों वहां पहुंचे | जब ज्ञान हो जायेगा ना तब भगवन से प्रेम होने लगेगा , अभी माया से प्रेम है | इसीलिए माया मैं रहते हुए भी उसके(ईश्वर के) प्रति प्रेम रखो , वह गोपी भक्ति है , प्रेम लक्षणा भक्ति है | इस संसार मैं रहते हुए भी राधा और कृष्ण मय रहो , शिव शक्ति मय रहो , ईश्वर मय रहो | ज्ञान बहुत जरुरी है की आप क्या समझ रहे हो ? आपको आपने बारे में ज्ञान नहीं है | लाख कोई समझावे तो भी आप नशे की तरफ ही जाते हो | गुटखा खाने वाले , दारू पिने वाले को रोज उपदेश दिया जाता है , लेकिन रात को १० बजे बोतल ही दिखती है , इतना खिंचा हुआ है | गुटखा ना मिले तो माथा फिरता है , चाय ना मिले तो शिर फिरता है , जरुरी नहीं है |

मैं भी मनुष्य हूँ , मेरे को कोई गुटखा का व्यसन नहीं है , कोई नशा नहीं है , चाय भी नहीं पिता हूँ | लेकिन कोई नियम नहीं है कोई प्रेम से कुछ दे तो ले भी लूँ , संकल्प नहीं है | मिला तो भी ठीक है , नहीं मिला फिर भी ठीक है | हमारी कोई जरुरत नहीं है की हमें ये ही चाहिए , कोई जरुरत नहीं | मेरे ह्रदय में वो बैठा हुआ है , स्वास लेता हूँ और छोड़ता हूँ तो सोऽहं चल रहा है | “सो” करके स्वास लेता है और “हं” करके छूटता है | इसका मतलब है जो वो है वही मैं हूँ | इसीलिए सोऽहं करते हुए में जी रहा हूँ | इसमें “ॐ ब्रह्मबाधिनी कुरु कुरु स्वाहा” एक मन्त्र है इसका कोई जाप करे तो माया भागती है , रहती नहीं है | यह माया को भगाती है | देवी देवता सब लोग जो है प्रार्थना करते है , राक्षश दैत्य भी प्रार्थना करते है तो गणपति का , सद्गुरु का स्मरण करके करते है की मैं यह जाप कर रहाहूं उसमे विघ्न ना आवे |

इसीलिए जगत को समझ करके चलोगे तो ईश्वर से प्रेम होगा , आपको समझ में नहीं आता तो माया की तरफ दौड़ते हो | सत्संग बहुत जरुरी है , उसमे भी गुरु का आशीर्वाद और कृपा बहुत जरुरी है | वह होगा तो माया आपसे दूर रहेगी | आप सब कुछ करते हुए भी लिपायमान नहीं होंगे , असंगलिप्त रहोगे , सबसे प्रेम करो लेकिन अंदर बैठा है उसे देखा करो | ज्ञान हो जाएगा , गुरु कृपा होगी तो आपका प्रेम उधर बढ़ेगा | समझने की कोशिश करोगे तो सफलता मिलेगी |

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