में जिसे यह मन्त्र देता हुँ उसे अनुभूति होती है, लेकिन मुझे अनुभूति नहीं होती ऐसा क्युँ ?

प.पु.पुनीताचारिजि महाराज

देखो भाई, अनुभूति की परिभाषा क्या है ? आप किसको अनुभूति कहते हो ? शरीर हाले डुले उसको अनुभूति कहते हो ? लाल पीला कलर दिखे उसको अनुभूति कहते हो ? कोई भगवान दिखे उसको अनुभूति कहते हो ? अनुभूति कया है,किस बात की अनुभूति ? अनुभूति वो है कि वो आपको शांति दे | देखो ये कलेक्टर है,वो डी.एस.पी है वो मामलतदार है,वो साहेब है, सरकार का आर्डर हुआ कि उस गांव में जाकर के १०-१० हजार,५-५ हजार जिसको जितनी जरूरत हो उतना पैसा दे दो , सरकार की तरफ से | और ये जाकर बांट रहे हैं, ओर वे सोचे कि किसी को ५००० दिया ,१०००० दिया ,मुझे तो कुछ मिला नहीं ! भाई ये बांटने के लिए दिया है और उसके पास जाएगा उसका वो सदुपयोग करेगा, वो भी बांटने वाला बनेगा ।

‌आप न्यायी हो और आप डिस्ट्रीब्यूट करने वाले हो, निमित्त बनकर के करो उसमें आसक्ति मत रखो | आपको नहीं मिला एसा मत सोचो, देने वाले को नहीं मिलता है| फिर भी न उसके पास वो पैसा रह जाता है , न आपके पास | सरकार का जो खजाना है उसको जरूरियात सिद्ध करा करके शांति देने के लिए दिया, सुख देने के लिए दिया है | तो आपको देने से जो सुख शांति मिलती है वो उसे खाने में मिलता है , और सरकार को बांटने में शांति मिलती है, बाकी पैसा किसी के पास रहता नहीं है। “हरि ॐ तत्सत् जय गुरुदत्त” जो हे वो शांति का स्वरूप है ,ब्रह्म हे वो,आप बांटोगे वहां जाकर शांति देगा।

‌देखो मैंने भगवान दत्तात्रेय को पूछा कि सबको ध्यान कराता हूँ तो सबको अनुभव होता है तो हम को तो कोई दिखता ही नहीं है ! तो वे बोल रहे थे कि – अभी भी तेरे को समज में नहीं आता, जो में दिखाता हूं उसको श्रद्धा उत्पन्न करने के लिए, तु तो गाढ श्रद्धालू है। उसको भगवान बताते हैं वो साक्षात्कार नहीं हे | किसी को भगवान दिख जाए तो वह साक्षात्कार नहीं हो गया, कभी कभी द्रश्यात्मक अनुभूति को जानना चाहिए।

‌पोरबन्दर से एक सोनी आया रहा, ये जोषी भाई को ख्याल है,ओर वो वैष्णव संप्रदाय का रहा बोला कि ध्यान करने के लिए आया हुँ और उसको ध्यान होल में भेजा, उसको ध्यान लगा, बाद में आया तो हम को साष्टांग किया और बहुत खुश होकर गया ओर भगवान दत्त की लीला क्या है ! उसको आशीर्वाद मिला तो वहां से निकला तो हमको आशीर्वाद देते जाने लगा ओर सबके लिए ऐसा ऐसा (आशीर्वाद देते हुए ) करके जाने लगा । मेने बोला इसको कुछ हो गया लगता है, तो वो बोला कि आप भी मुझे जान लो , मैं अब समझ गया की मैं कौन हूं ! तो गया पोरबंदर ,तो सोनी का धंधा तो बंद कर दिया और सबको बोले कि – मेरी पत्नी लक्ष्मी है, मैं विष्णु हूँ, आप लोग पहचान सको तो पहचान लो । तो लोग उसको थोडे दिन के बाद पागल कह दिए, ये समझे नहीं ये क्या हैं, एक महिना दो महीने के बाद धंधा बंध होने लगा ओर बहुत नर्वस हो गया, फिर जो है यहां ले आए लोग । लोग बोले – यहीं से उसको कुछ दिखा तो कया मतलब है | मैंने बोला ये विष्णु कि साधना करता रहा, “देवो भूत्वा देवं यजेत” देवता बनकर के देवता की उपासना करनी चाहिए। तुम शंकर की उपासना करते हो , तो शिवोऽहम् शिवोऽहम् शिवोऽहम् करो। ब्रह्मोस्मि, रमोऽहम् , कृष्णोऽहम् ,दत्तोऽहम् | में वही हूँ जिस का भजन कर रहा हूं | ऐसे मानकर के साधना करो। तो सोनी को मैंने बोला तेरे को यै बता रहे हैं कि विष्णु की साधना करोगे तो उस लोक मे जाएगा, विष्णु ही हो जाएगा। तेरी पत्नी जो है वो लक्ष्मी का स्वरूप लेगी ऐसे साधना करते करते स्वरूप बदलता है, साधक वहाँ पहुंच जाता है । तो तु तो यही विष्णु बन गया,साधना तो रह गई । भगवान दिख गया तो साक्षात्कार नहीं हो गया | लेकिन आपकी श्रद्धा बढे, आपकी भक्ति आगे बढे, आपको लगे कि हमको कुछ मिल रहा है इसलिए दर्शन कराया जाता है। इसके लिए आपको कुछ बताया जाता है, कुछ क्रिया ये होती हैं कि आपको ख्याल आवे कि हमारे उपर कृपा है | और जिस पर पूर्ण कृपा हो जाती है, गणित सॉल्व हो जाता है, तो वो स्थिर हो जाता है । शिवोऽहम् , ब्रह्मोऽहम् ,कृष्णोऽहम्, दत्तोऽहम् । तो आपको जो अनुभूति नहीं ऐसा नहीं, लेकिन आपको तो गाढ अनुभूति हे, तो ही इन सबको बांट रहे हो, दे रहे हो | आप जैसा कोई श्रीमंत नहीं है,आप जो है ऐसे ओफिसर हो जिस पर सरकार की आप पर आस्था है, विश्वास है, ये डिस्ट्रीब्यूट करने के लिए संपत्ति दे रहे हैं | आप जो संतुष्ट हो न, संतोष ,उससे बड़ा कोई धनि नहीं है । इसलिए आप बड़े ओफिसर हो , करोड़ों करोड़ों सरकार का पैसा किसी गरीब को बांट रहे हो, दे रहे हो | तुम खुद ही श्रीमंत हो, में तो यहा संतुष्ट रहता हुँ | पैसा आपका है लेकिन वो खजाने के बीच में बैठता है, लेकिन देखो, आप देख सकते हो “Don’t touch” “छुना नहीं” , छुओगे तो खतरा , बैंक मैनेजर पैसा ले लिया तो गई नौकरी ।

‌इसलिए आप जो है “हरि ॐ तत्सत् जय गुरु दत्त” बांट रहे हो, सबका भला कल्याण हो रहा है ,वो शांति आपको मिल रही है। जगत का भला करके खुश रहना यही संतोष है। उसका भला देख कर के आपको संतोष न हो तो आप असंतुष्ट हो, हमको नहीं हो रहा है! अरे! कितना चाहिए आपको, आपको तो भरपूर दे दिया है,बांट रहे हो जिसको अनुभव होगा वो शांति का असर आपको होगा, इसलिए आपको कुछ दिखना-सूनना जरूरी नहीं है। ‌मन शुद्ध रहे,प्रसन्न रहे, संतुष्ट रहे ओर व्यापक चैतन्य तत्त्व में आप बिराजमान रहो, सोऽहम् चल रहा है, इससे बड़ी प्राप्ति कुछ नहीं है | वो दिखना जरूरी नहीं है | इसलिए जो साधक के मन में होता है कि हम को अनुभूति नही होती हे उनको ज्ञान नहीं है,आप स्वयं उसके स्वरूप हो ये मानकर के चलो सोऽहम् में रहो और संतुष्ट रहो ‌समजे आप लोग ?

‌इसलिए ये मंत्र दत्तात्रेय ने सारे विश्व को दिया है,सारी सृष्टि में जो भी करेगा उनको अनुभव होगा, ऐसा ना गुरु मिलेगा ऐसा ना मंत्र मिलेगा । में किसी संप्रदाय, पंथ का खंडन नहीं करता हूँ | सबको वंदन करता हूँ । राम मंत्र हो , कृष्ण मंत्र हो, शिव मंत्र हो, कूरानी मंत्र हो, जय स्वामीनारायण हो, ॐ नमो अरिहंताणां हो सब मंत्र महान है, लेकिन वो मंत्र के पीछे कोई गुरु चहीए जो सिद्ध करा कर उस ईष्ट के पास पहुचा दे। “हरि ॐ तत्सत् जय गुरुदत्त” व्यापक चैतन्य तत्त्व , सदगुरु है | जिसको भी जिससे भी मिलना हो ये मंत्र बोलकर जपोगे तो उस भगवान के पास पहुंचा देगा, ये ऐसा तत्त्व है। व्यापक तत्त्व है | ये संप्रदाय, पंथ में बद्ध नहीं है | जहाँ करोगे वहाँ हाजिर हो जाता है, इसलिए मेरा चेलेंज रहता है कि कोई भी संप्रदाय के लोग आओ , उनको भी शांति मिलती है। इसलिए मैं सबका सत्कार करता हुँ | सबको वंदन करता हूँ | इस मंत्र को जप कर के शांति प्राप्त करो, इस युग में ऐसी सरल वस्तु कोई देगा नहीं जो दत्त सरकार ने दे दिया है | कितनी भी साधना करो सिद्धि नहीं मिलती | लेकिन महाराज का ये मंत्र करके चलो तो सब काम सफल हो जाता है। इससे सरल ओर क्या दे,ओर ये खुद के लिए कुछ आपसे मांगते भी नहीं है | लेकिन मौन भाषा में बोलते हैं, तेरे को मैं कुछ भेज रहा हुँ, दे रहा हुँ तो उसका सदुपयोग करना मौन भाषा में बोलते हैं | समजे आप लोग। इनके लिए कुछ नहीं मांगते, ये इनकी कृपा है |

‌अब यहाँ विश्व में दिखाई पडे ऐसा, आस्था बढे ऐसा मंदिर बन रहा है। प्रेरणा इनकी होगी,आप लोगो की होगी। आप लोग बना रहे हो,मै नहीं बना रहा हुँ | और मंदिर बन जाएगा ,सारी दुनिया में दिखाई पड़ेगा। आप ऊपर(गिरनार) जाते हो तो यहीं पर दर्शन होने लगेगा। फिर भी उपर जाओ हर्जा नहीं, लेकिन दत्त मंदिर बनेगा। इसमें सभी देवी-देवता रहेंगे, गणपति, माँ, हनुमानजी सब रहेंगे । सब लोग दर्शन करेंगे, लाखों करोड़ों लोग यहाँ आकर के शांति प्राप्त करेंगे | अभी तो आप थोडे बैठे हुए है। वो बनेगा | कैसे बनेगा खबर नहीं, ये(दत्तात्रेय) बना देंगे। ओर हो जाएगा, दाता कोई निकलता है आप ही लोगों में से, कोई पत्थर दे रहा है, कोई मजदूरी दे रहा है, कोई सिमेन्ट दे रहा है,सब हो रहा है | न मैया मांगती है न में मांगता हुँ | मेरे चरणमे रखो ऐसा नहीं बोलता हुँ | उसमें आप चेक से दो ,पहोंच फड़ाओ कुछ भी करो, कुछ नहीं देना हो तो टोकन भेज दो, सिमेन्ट भेज दो, आप हिसाब किताब रखो हमको नहीं रखना। इस भाव मे में जी रहा हुँ, सब अच्छा हो रहा है,अगर कुछ पेटी में डाल देते हो तो खोलने वाले खोल लेते हैं तो इसने पूछो उसका क्या होता है, मैरे को बताते है की इतना आया | हम बोलते है बहुत अच्छा है | कभी मेरे को दे तो ले भी ले ता हुँ , और अभी यज्ञ हो रहा है उसमें दक्षिणा बांट दूंगा बा्ह्मणो को | कंद सूरण खाके चला लेता हुँ | ये भी कही कही से आ जाती है, (मैयाश्री) भंडारा चलाती है। अन्नक्षेत्र चलता है।सब अच्छा हो रहा है | दाता आप हो, करने वाला वो है, हम खाली द्रष्टा बनकर देख रहै है। परम शांति है। समजे आप लोग ?

‌दत्तात्रेय जो हे असंग-अलिप्त हैं, और सबका कल्याण करने वाले व्यापक सद्गुरू हे, भेदभाव नहीं रखते हैं, कि हिन्दू हो,मुस्लिम हो,क्रिस्चियन हो, पारसी हो कि किसी भी संप्रदाय जाति का हो सब को सम कृपा उनकी बरसती है | ये दत्तात्रेय है। कोई बाउन्डरी नहीं है इसकी । जो मानता है वहीँ हाजर रहते है | इसलिए “हरि ॐ तत्सत् जय गुरुदत्त” ध्यान का मंत्र है। इससे ध्यान लगता है सारी इच्छाएं पूरी होती है विध्न बाधा दूर होता है, सारा माहोल शुद्ध हो जाता है। इस मंत्र के करने से मूठ-चोट , जादू-मंतर नहीं लगता है। इस लिए भ्रम हटा देना | माताओ, बहेनो को नजर लगा वो लगा भ्रम हटा देना , यह मन्त्र करना अच्छा रहेगा । ये मंत्र परम शांति के लिए है। आप प्रचार करो आपको शांति मिलेगी। लाखो का भला कर रहे हो, इसका पूण्य आपको मिल रहा है, इससे ज्यादे ओर क्या चाहिए ?

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