ये योग है, योग की साधना है, ये अंतःकरण चतुष्ठय है , पांच तत्वों का बना हुआ ये शरीर है | इसके अंदर मन, चित, बुद्धि और अहंकार है , उसके बाद आत्मा है | तो पांचवा है ना(आत्मा) वो कछुआ है जो चलता है, चार पैर निकाल कर चलता है । कोई आदमी आकर उसे देख ले तो चारों पैर को अंदर कर के और सब समेट कर बैठ जाता है । तो गुरु और भय , इन दोनों से भजन होता है । तो मन, चित्त , बुद्धि ओर  अहंकार इस कछुए(आत्मा) के चार पैर है और वह(आत्मा) बैठा हुआ है | करता है वह(कछुआ/आत्मा) और लगता है कि हाथ से चल रहा है, पैर से चल रहा है, मुंह से खा रहा है, आंख से देख रहा है , सब हो रहा है, सारा जग का काम करता है । लेकिन यंत्र को चलाने वाला साक्षी रूप से अंदर बैठा है, वह कुछ नहीं करता । वह चाप दबा दिया और मशीन चल रही है। बुद्धि इधर भाग रही है, मन उधर भाग रहा है, चित्त कहीं और भाग रहा है , अहंकार अंदर है | तो मन जो है “चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्“ , हे कृष्ण ! आप गीता सुनाए ,सब कुछ मैं सुन रहा, फिर भी मन भागता ही है, बड़ा चंचल है | एक मिनट में कहां-कहां दौड़ आता है, मन से ज्यादा गति इस जगत में किसी की भी नहीं है | इतना भागता है | लेकिन, मन जो है ना उसके ऊपर गधे की तरह वजन रख दो तो ज्यादा भागेगा नहीं ,धीरे धीरे चलेगा | गधे के ऊपर वजन रख दो तो वह भागेगा नहीं । तो मन के अंदर ईश्वर को रखो, मन जो है उसको भगवान के चरणों में रखो | वहां बैठ कर के उसका स्मरण रखना, मन वहां जाएगा |

मन के अंदर चित्त  है, चिंतवन , जो चिंतवन करते  हो |  न चिंतवन करने जैसी वस्तुओं का भी चिंतवन करते हो। मन-चित् और उसके बाद है बुद्धि उसको चिंतवन में मदद में लेते हो | बुद्धि जो है, भगवान कृष्ण ने बोला है अर्जुन को कि तेरी बुद्धि सुधारने के लिए मैं “ददामि बुद्धियोगं” बुद्धि योग दे रहा हूं, “सात्विकम् बुद्धि” सात्विक बुद्धि दे रहा हूं। बुद्धि को शुद्ध कर मन को मेरे में रखेगा और चिंतवन मेरा करेगा और बुद्धि मेरे चरण में रखेगा तो शुद्ध हो जाएगी, उसके अंदर की कर्कशता हट जाएगी | बुद्धि शुद्ध हो न तो व्यक्ति अच्छे मार्ग में चले । लेकिन यह जल्दी  शुद्ध नहीं होता है, कितने भी प्रवचन आप सुनो, पढ़ो , लेकिन नहीं होता है। गुरुकृपा बिना यह संभव नहीं है । इसलिए मन, चित्त, बुद्धि और अहंकार जो है वह चारों पैर है आत्मा के, वह बाहर निकले हुए हैं उनको खींच कर के अपने में ले आओ ,कछुआ के तरफ से ,और स्थिर रख करके भगवान का ध्यान करो । मन दौड़ता है तो उसे जाने दो , बोलो कि तेरे को जाना हो तो जा मैं चरण में बैठा हूं । मैं ईश्वर के सानिध्य में हूं | मन को जहां पर फिर ना हो फिरे , बुद्धि तु जो करती हो वह कर, मैं तेरा साथ नहीं दे रहा। मेरा तो स्वभाव भगवान के चरण में है | तो सबको खींच कर के आप ईश्वर के चरणों में रखोगे तो मन, चित्त, बुद्धि शुद्ध हो जाएगा और अच्छा विचार आएगा | अच्छे मार्ग में चलोगे ।

बारंबार सुनने के बाद भी ये जल्दी होता नहीं है , मैं बहुत उपदेश देता हूं , रोज बोलता हूँ , बहुत से लोग सत्संग सुनते है | लेकिन जब समय आएगा तब मावा, गुटका, खैनी आ ही जाएगा हाथ में | सब सत्संग कहां चला जाता है  खबर नहीं पड़ती | कितना भी सुनाओ असर नहीं करता | क्यों ? क्यूंकि आपको सुन लेना है करना नहीं है। ईश्वर के चरणो में समर्पण नहीं है | समर्पित हो जाओ तो फिर यह सब हट जाता है । आपकी तरह से मेरे भी माता-पिता रहे होंगे, मेरा भी शरीर है | खाना खाता हूं, लेकिन कोई व्यसन नहीं है | किसी के बगैर ना चले ऐसा नहीं है। सुरण खाता हूँ, हमारे रसोईया से पूछ लेना, 50 बरस से खाना बना रहा है, रोज सुरण खाता हूँ | और दही मिले तो ठीक है नहीं मिला तो उसमें टमाटर मिलाकर खा लेता हूं, टमाटर ना हो तो ऐसे ही खाली सुरण खाकर पानी पी लेता हूं, मस्त रहता हूं, कुछ नहीं चाहिए । लेकिन मेरा मन परमात्मा के तरफ लगा हुआ है | लगता है कि कितने जन्म भटका हूँ अब तेरे चरण में समा जाना है । अब और कुछ चाहिए ही नहीं | यह वृत्ति जगी है, सब इनकी कृपा(दत्तात्रेय महाराज की कृपा) से | और जब सोता हूं, जागता हूं, उन्हीं की याद आती है और हरि भजन जपता रहता हूँ | नींद ही नहीं आती है , क्योंकि उसका चरणकमल दिखता है तो लगता है कि कब जल्दी पहुंच जाऊं , कब उसमें समा जाऊं, 24 घंटे यही चिंतवन रहता है | कभी अश्रुपात भी होता है तो कभी खुश भी होता हूँ , हर एक परिस्थिति में जी रहा हूँ | लेकिन मेरे को बहुत प्रिय वही(ईश्वर) है और कुछ नहीं। ओर कुछ नहीं दिखता है, यह कृपा है उसकी । अगर अहंकार आ जाए कि में सब से पर हो गया हूँ, तो मेरे को प्रतीत हो जाएगा, अहंकार नहीं आने देता। समर्पण में कभी अहंकार नहीं आता है। इसीलिए समर्पण भाव से मन, चित्त,बुद्धि को वही रखता हूं और ईश्वर को प्रार्थना करता हूँ |

खान-पान में शुद्धि भी बहुत जरूरी है । उससे मन, चित्त, बुद्धि सुधरता है । सात्विक विचार आता है । राजस तामस खोराक ना खाओ तो मन, चित्त, बुद्धि शुद्ध रहती है । इसीलिए सात्विक खोराक अच्छा हैं । सुरण सात्विक ही है | जैन लोग नहीं खाते हैं कंदमूल, तो उनकी इच्छा | सुरण ही खा के रहूँ ऐसा भी नहीं है , केला हो तो केला खालूँ , सेब मिले तो वह खालूँ , इस शरीर को रखने के लिए जो भी डालना चाहिए वह डालता हूँ | “शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्” , शरीर टीका करके इस गाड़ी को ठीक ठाक कर के स्टेशन पर ले जाता हूं । एक्सीडेंट हो जाए तो वैद-डॉक्टर के पास गेराज में डालकर दवा करवा लेता हूँ , लेकिन इसी शरीर से वहां(ईश्वर के पास) पहुंचना है, इसी गाड़ी से स्टेशन पर पहुंचना है, दूसरी गाड़ी बदलनी नहीं है। गाड़ी बदलने के बाद बड़ी मुसीबत होती है।  बहुत गाड़ी बदला और नया लिया भी , लेकिन अब नहीं बदलना है , यह ध्यान रखोगे ना तो पहुंच जाओगे।  इसीलिए यह वैसे है बहुत कठिन , गुरुकृपा सिवाय होगा नहीं | इसीलिए भगवान से प्रार्थना करो कि मेरी मन, चित्त, बुद्धि शुद्ध करके अपने चरण में लगाओ । अगर सब कुछ करते हुए मन, चित्त, बुद्धि को ईश्वर में लगाओगे तो सारी शक्तियां आपके साथ आएगी और फिर विघ्न नहीं आने देगी , विघ्न करने वाला अपने आप हट जाएगा, दुखी हो जाएगा ,वह आपके पास नहीं पहुंच सकता, आर्डर हो जाता है ईश्वर की कृपा से ।

इसीलिए आप लोग हमारे को प्रश्न तो पूछते हो , तो सुनना और अंदर भी उतारो | अपने अंदर घुस कर के देखो कि मैं कहां हूं ? मेरी मन, चित्त, बुद्धि ईश्वर में है कि कुछ और जगह पर है ? गुटका, तंबाकू या दारू में है या फिर माया में है ? अगर इनमे हो तो टालने की कोशिश करना । सुनते हो लेकिन करते कुछ नहीं हो ।  करोगे तो ईश्वर प्राप्ति हो जाएगी, लेकिन “यततामपि सिद्धानां कश्र्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः” (अर्थात सिद्धि प्राप्त करने वालों में से कोई कोई विरला ही कोई मुझे वास्तव में जान पाता है), लाखों लोग चलते हैं ईश्वर प्राप्ति में, लेकिन पहुँचते है लाखों-करोड़ों में से कोई एक । सब लोग फिसल जाते हैं, कहीं माया में, कहीं अर्थ प्राप्ति में, कहीं प्रतिष्ठा में, कहीं मोह में । चलते हैं सब लेकिन पहुंच नहीं पाते है ।  भगवान ने बोला है ”यततामपि सिद्धानां”  कोई एकाद ही मेरे पास पहुंचता है, जिसके ऊपर गुरु कृपा हो और निष्ठा खूब हो वह पहुंच जाता है । इसीलिए बहुत विघ्न आता हैं इसमें इसीलिए बहुत संभल कर चलोगे तो पहुंच जाओगे ।

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